किताब से प्यार का वो सुनहरा दौर
इतिहास में एक ऐसा वक़्त भी रहा है जब मुसलमानों की पहचान उनकी फ़ौजें या राज्य नहीं थे — बल्कि उनके घरों में सजी किताबों की अलमारियाँ थीं। यह वो समय था जब पढ़ना-लिखना सिर्फ़ मदरसों और मस्जिदों तक सीमित नहीं था, बल्कि गली के सिपाही, बाज़ार के दुकानदार और मस्जिद के साधारण नमाज़ी — सब के दिलों में किताब से मुहब्बत थी। मुस्लिम समाज में किताब रखना गर्व की बात मानी जाती थी — जैसे किताबें घर को सुंदर बनाती थीं और मालिक की इज़्ज़त बढ़ाती थीं। पुराने दस्तावेज़ बताते हैं कि बेटियों की शादी में किताबों का संग्रह दहेज में दिया जाता था, और ख़ुशी के मौक़ों पर किताबें तोहफ़े में दी जाती थीं। इसी किताब की मुहब्बत ने मुसलमानों को विज्ञान, चिकित्सा, खगोल शास्त्र और दर्शन में पूरी दुनिया से आगे पहुँचाया।
यरूशलम — ज्ञान और आस्था का शहर
यह कहानी चौदहवीं सदी के यरूशलम (Jerusalem) से जुड़ी है — वो शहर जो तीन बड़े धर्मों का पवित्र केंद्र होने के साथ-साथ इस्लामी दुनिया का एक महत्वपूर्ण शिक्षा-केंद्र भी था। मस्जिदे अक़्सा और क़ुब्बतुस्सख़रा (Dome of the Rock) की छाया में बसे इस शहर में विद्वान, मदरसे, पुस्तकालय और ज्ञान की बैठकें हर तरफ़ नज़र आती थीं। ममलूक शासन के दौर में यरूशलम पढ़ाई-लिखाई का बड़ा केंद्र था — यहाँ के बाज़ारों में पुरानी हाथ से लिखी किताबें (manuscripts) बिकती थीं, और इल्म की रोशनी हर घर तक पहुँचती थी। इसी शहर के पढ़े-लिखे माहौल ने बुरहानुद्दीन जैसे साधारण इंसान को भी किताबों का दीवाना बना दिया।
बुरहानुद्दीन — एक साधारण पाठक का शानदार पुस्तकालय
बुरहानुद्दीन अल-नासिरी मस्जिदे अक़्सा में पार्ट-टाइम क़ारी (क़ुरान पढ़ने वाले) थे — न कोई बड़े धार्मिक विद्वान, न किसी अमीर के सलाहकार, और न ही धनी व्यक्ति। उनकी कमाई सीमित थी, लेकिन पढ़ने का शौक़ बेहिसाब था। जब चौदहवीं सदी में उनका इंतक़ाल हुआ, तो उनके पास तीन सौ से ज़्यादा किताबों का निजी पुस्तकालय था — एक ऐसा ख़ज़ाना जो किसी बड़े राजा के महल में भी क़ाबिले-तारीफ़ होता। उनकी मौत के बाद यह पुस्तकालय सार्वजनिक नीलामी में बेचा गया, और उस नीलामी की सूची आज भी इतिहास में सुरक्षित है।
उस नीलामी में सिर्फ़ विद्वान नहीं आए थे बल्कि दुकानदार, सिपाही और आम नागरिक भी शामिल हुए। यह दृश्य बताता है कि उस ज़माने में किताब ख़रीदना और पढ़ना सभी वर्गों का जज़्बा था — जहाँ अमीर-ग़रीब, पढ़े-लिखे और आम लोग सब एक जैसे उत्साह से ज्ञान की तलाश में थे।
पुस्तकालय की विविधता — एक खुले दिमाग़ का सबूत
बुरहानुद्दीन के पुस्तकालय की सबसे दिलचस्प बात उसकी विविधता थी। उनके पास धार्मिक किताबें तो थीं ही, साथ में साहित्य, कविता, इतिहास, भूगोल और आध्यात्म पर भी बढ़िया किताबें मौजूद थीं। यह इस बात का सबूत है कि उस ज़माने का एक साधारण पाठक भी सिर्फ़ धार्मिक किताबों तक नहीं रुकता था, बल्कि दुनिया को समझने और ख़ुद को बेहतर बनाने की चाहत उसे हर विषय की तरफ़ ले जाती थी। ज्ञान की यही व्यापकता वो रहस्य था जिसने मुसलमानों को दर्शन से लेकर चिकित्सा तक, खगोल शास्त्र से लेकर गणित तक — हर क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने का मौक़ा दिया।
आज का दर्द — किताबों से दूरी, तरक़्क़ी से दूरी
अगर आज के मुस्लिम समाज की तरफ़ नज़र डालें तो तस्वीर उदास करने वाली है। दुनिया की शीर्ष 56 पुस्तक प्रकाशन कंपनियों में से एक भी किसी मुस्लिम देश में नहीं है। मुस्लिम देशों में प्रति व्यक्ति किताब पढ़ने की दर बहुत कम है, और शोध व अनुसंधान का माहौल भी काफ़ी हद तक ग़ायब है। विशेषज्ञों के अनुसार इस पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह यही है कि जब क़ौम ने किताब से नाता तोड़ा, तो तरक़्क़ी के दरवाज़े भी बंद होते चले गए।
बुरहानुद्दीन की कहानी हमें एक आईना दिखाती है — यह आईना किसी राजा का नहीं, किसी बड़े दार्शनिक का नहीं। यह एक सीधे-सादे इंसान का आईना है, जिसके पास पैसा नहीं था मगर ज्ञान की भूख थी। और उसी भूख ने उसे अपने ज़माने का इज़्ज़तदार इंसान बना दिया। जिस क़ौम में बुरहानुद्दीन जैसे लोग होते हैं — वो क़ौम कभी अँधेरे में नहीं रहती। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने घरों में एक बार फिर किताब का चिराग़ जलाएँ — क्योंकि जो क़ौम किताब से प्यार करती है, दुनिया उस क़ौम से प्यार करती है।
अहमद सुहैब नदवी
अल-इमाम गज़ेट
Email: al.emam.education@gmail.com
Al-Emam Al-Nadwi Education & Awakening Center
New Delhi, India
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📚 स्रोत:
यह वाक़िया जर्मन इतिहासकार और इस्लामिक अध्ययन के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर Konrad Hirschler की शोध-पुस्तक से लिया गया है।
Konrad Hirschler, The Written Word in the Medieval Arabic Lands: A Social and Cultural History of Reading Practices, Edinburgh University Press, 2012.


